जब दुनिया ने परमाणु ऊर्जा को बांधना सीखा। जानिए IAEA की स्थापना क्यों, कब, और कैसे हुई?
दुनिया को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की दिशा में एक नई राह पर ले जाने वाली ऐतिहासिक पहल

29 जुलाई, यह तारीख इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ की गवाह है। आज ही के दिन, 1957 में, एक ऐसी संस्था का जन्म हुआ जिसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली खोजों में से एक को नियंत्रित करने का बीड़ा उठाया – अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, जिसे हम सभी IAEA के नाम से जानते हैं।
यह सिर्फ एक और अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं है। यह एक वैश्विक प्रहरी है, जो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने और इसके विनाशकारी दुरुपयोग को रोकने के लिए अथक प्रयास करता है। कल्पना कीजिए, एक ऐसी दुनिया जहाँ परमाणु ऊर्जा बिना किसी निगरानी के स्वतंत्र रूप से संचालित होती, जहाँ हर राष्ट्र अपनी मर्जी से परमाणु हथियार विकसित करता। वह भयावह परिदृश्य है जिससे IAEA (International Atomic Energy Agency) हमें बचाने के लिए बनाई गई थी।
क्यों पड़ी IAEA की ज़रूरत?
दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों ने मानवता को एक ऐसी चेतावनी दी थी जिसे कोई भी भुला नहीं सकता था। परमाणु ऊर्जा की अविश्वसनीय शक्ति ने दुनिया को विस्मय में डाल दिया था, लेकिन इसके विध्वंसक पहलू ने गहरी चिंता भी पैदा की थी। एक तरफ, परमाणु ऊर्जा में असीमित ऊर्जा प्रदान करने और चिकित्सा, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में क्रांति लाने की क्षमता थी। दूसरी तरफ, इसका उपयोग बड़े पैमाने पर विनाश के हथियार बनाने के लिए किया जा सकता था।
इसी दुविधा के बीच, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता महसूस की जो इस दोधारी तलवार को संभालने में मदद करे। लक्ष्य स्पष्ट था: परमाणु ऊर्जा का उपयोग मानवता की भलाई के लिए हो, न कि उसके विनाश के लिए। IAEA की स्थापना का विचार सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइज़नहावर द्वारा वर्ष 1953 में दिए गए एक ऐतिहासिक भाषण "Atoms for Peace" के दौरान सामने आया था। इस भाषण में उन्होंने सुझाव दिया कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग युद्ध की बजाय शांति और विकास के कार्यों में किया जाना चाहिए।
इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई, और अंततः संयुक्त राष्ट्र की छत्रछाया में 29 जुलाई 1957 को IAEA की स्थापना हुई। इसका मुख्यालय ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में स्थित है।
IAEA का जनादेश
IAEA का जनादेश बेहद व्यापक और महत्वपूर्ण है। IAEA का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कार्य परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-Proliferation) है। इसका मतलब है परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना। IAEA सदस्य देशों में परमाणु सुविधाओं का निरीक्षण करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि परमाणु सामग्री का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। ये निरीक्षण, जिन्हें 'सेफगार्ड्स' कहा जाता है, यह सुनिश्चित करते हैं कि परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम गुप्त रूप से हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल न हों। यह एक जटिल और संवेदनशील कार्य है, जिसमें उच्च स्तर की तकनीकी विशेषज्ञता और कूटनीति की आवश्यकता होती है। जब भी आप ईरान के परमाणु कार्यक्रम या उत्तर कोरिया की गतिविधियों के बारे में सुनते हैं, तो आप अनजाने में IAEA की भूमिका को महसूस करते हैं।
IAEA केवल 'ना' कहने वाला संगठन नहीं है। यह सक्रिय रूप से परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा भी देता है। इसमें शामिल हैं:
ऊर्जा उत्पादन: सुरक्षित और टिकाऊ परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विकास और संचालन में सदस्य देशों की सहायता करना। यह उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिनकी ऊर्जा ज़रूरतें बढ़ रही हैं और जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं
स्वास्थ्य और चिकित्सा: कैंसर के इलाज के लिए विकिरण थेरेपी में परमाणु तकनीकों का उपयोग, चिकित्सा उपकरणों के स्टरलाइजेशन, और नई दवाओं के विकास में सहायता करना।
कृषि: फसल सुधार, कीट नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा में परमाणु तकनीकों का उपयोग करना। उदाहरण के लिए, विकिरण का उपयोग करके म्यूटेशन प्रजनन से अधिक उपज देने वाली या कीट प्रतिरोधी फसलें विकसित की जा सकती हैं।
जल संसाधन: जल चक्र को समझने, भूजल स्रोतों का पता लगाने और जल प्रदूषण की निगरानी के लिए आइसोटोप तकनीकों का उपयोग करना।
पर्यावरण संरक्षण: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने और प्रदूषण की निगरानी के लिए परमाणु तकनीकों का उपयोग।
यह स्पष्ट है कि IAEA एक बहुआयामी संगठन है जो केवल निगरानी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव कल्याण के लिए परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी की क्षमता का भी दोहन करता है।
भारत और IAEA (International Atomic Energy Agency)
भारत, अपनी समृद्ध वैज्ञानिक विरासत और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के साथ, IAEA का एक सक्रिय और प्रतिबद्ध सदस्य रहा है। 1957 में इसकी स्थापना के बाद से ही भारत ने इस संस्था के लक्ष्यों और उद्देश्यों का समर्थन किया है। भारत का अपना तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है, और यह IAEA के साथ मिलकर काम करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसके कार्यक्रम उच्चतम सुरक्षा मानकों का पालन करते हैं। भारत ने IAEA की विभिन्न पहलों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, चाहे वह परमाणु सुरक्षा बढ़ाने के लिए ज्ञान साझा करना हो, तकनीकी सहायता प्रदान करना हो, या अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा कानून के विकास में भाग लेना हो। यह साझेदारी वैश्विक परमाणु शासन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण है।
IAEA को हमेशा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, चाहे वह गैर-अनुपालन वाले देशों से निपटना हो, आतंकवादियों के हाथों में परमाणु सामग्री जाने के जोखिम को कम करना हो, या बढ़ते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करना हो। आज IAEA की भूमिका पहले से भी अधिक जटिल और महत्वपूर्ण हो चुकी है। दुनिया के कई हिस्सों में परमाणु हथियारों की होड़, तकनीकी जटिलताएं, और राजनीतिक अस्थिरता जैसे कई मुद्दे इस संस्था के समक्ष चुनौती बनकर खड़े हैं।
लेकिन इन सब के बावजूद, IAEA एक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य संस्था बनी हुई है। जैसे-जैसे दुनिया ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों से जूझ रही है, परमाणु ऊर्जा एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में सामने आ सकती है, और ऐसे में IAEA की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। यह सुनिश्चित करना कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग सुरक्षित, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से हो, मानवता के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
📚 Reference Books
- लुसेंट सामान्य ज्ञान – डॉ. बिनय कर्ण एवं मनवेन्द्र मुकुल
- एरिहंत सामान्य ज्ञान 2025 – एरिहंत विशेषज्ञ
- मनोरमा ईयरबुक (हिंदी संस्करण) – मलयाला मनोरमा
- भारत 2025 – प्रकाशन विभाग, भारत सरकार
- भारतीय संविधान का परिचय – लक्ष्मीकांत
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IAEA की स्थापना न केवल एक वैज्ञानिक निर्णय था, बल्कि यह मानवता के लिए एक नैतिक और जिम्मेदार पहल थी। 29 जुलाई को, जब हम IAEA की स्थापना की वर्षगांठ मनाते है। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि कैसे एक वैश्विक प्रयास ने सबसे शक्तिशाली तकनीकों में से एक को मानव कल्याण के लिए निर्देशित करने में मदद की है। यह एक निरंतर चलने वाला कार्य है, लेकिन एक ऐसा कार्य है जो निश्चित रूप से इसके लायक है। 1957 में बनी यह संस्था आज भी वैश्विक परमाणु मामलों पर निगरानी और मार्गदर्शन का सबसे विश्वसनीय स्त्रोत बनी हुई है।
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