असहयोग आंदोलन क्या था? गांधी जी ने कैसे शुरू किया आज़ादी का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण संघर्ष
01 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। जानिए इसके पीछे की घटनाएं, मुख्य उद्देश्य, प्रभाव और इतिहास में इसकी अहमियत।

क्या आपको पता है, आज से 105 साल पहले, यानी 1 अगस्त 1920 को, भारत के इतिहास में एक ऐसा दिन दर्ज हुआ था जिसने हमारी आज़ादी की लड़ाई की दिशा ही बदल दी? यह वो दिन था जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ एक अनोखे, लेकिन बेहद शक्तिशाली हथियार का ऐलान किया था – असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement)। यह सिर्फ़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था। यह एक जन-क्रांति थी, एक ऐसी अहिंसक पुकार जिसने पूरे देश को जगा दिया। इस आंदोलन ने न केवल भारतीय जनमानस को जागृत किया बल्कि स्वराज की मांग को एक नई दिशा भी दी। आइए, जानते हैं इस महान आंदोलन की पूरी कहानी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
क्यों ज़रूरत पड़ी असहयोग आंदोलन की? – वो चिंगारी जिसने आग भड़काई
1920 तक आते-आते, भारतीय जनता ब्रिटिश सरकार से पूरी तरह निराश और हताश हो चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया था, इस उम्मीद में कि युद्ध के बाद उन्हें स्वशासन (self-rule) मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय, कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने भारतीयों के गुस्से को और भड़का दिया।
रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) 1919: इस 'काले कानून' ने ब्रिटिश सरकार को बिना किसी मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने का अधिकार दे दिया था। यह भारतीयों के मौलिक अधिकारों का हनन था और इसे "बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील" वाला कानून कहा गया। गांधी जी ने इसे "काला कानून" बताते हुए इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया, जो बाद में असहयोग आंदोलन का आधार बना।
जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre) 1919: 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया। रॉलेट एक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा हो रही थी, जिस पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। इस नृशंस हत्याकांड में सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया और ब्रिटिश न्याय पर से विश्वास उठा दिया। इस घटना ने गांधी जी को ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीयों का असहयोग करने के लिए प्रेरित किया।
खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement): प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा (जो मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेता थे) के साथ ब्रिटेन द्वारा किए गए दुर्व्यवहार ने भारतीय मुसलमानों को आक्रोशित कर दिया था। गांधी जी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का एक सुनहरा अवसर देखा और खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया।
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से निराशा (Disappointment with Montagu-Chelmsford Reforms): 1919 में लाए गए इन सुधारों से भारतीयों को लगा कि उन्हें केवल सीमित अधिकार दिए गए हैं और स्वशासन का उनका सपना अभी भी दूर है।
इन घटनाओं ने भारतीयों के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरी निराशा और आक्रोश पैदा कर दिया। गांधी जी ने महसूस किया कि अब समय आ गया है कि ब्रिटिश सरकार को उसकी नीतियों के लिए असहयोग किया जाए, क्योंकि वे 'दानव राज' चला रहे थे।
असहयोग आंदोलन की घोषणा और उद्देश्य – एक नया रास्ता
1 अगस्त 1920 को, महात्मा गांधी ने औपचारिक रूप से असहयोग आंदोलन की घोषणा की। यह आंदोलन सत्याग्रह (सत्य और अहिंसा) के सिद्धांत पर आधारित था। गांधी जी का मानना था कि अगर भारतीय एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करना बंद कर दें, तो ब्रिटिश राज एक साल के भीतर ढह जाएगा।
इस आंदोलन के मुख्य उद्देश्य थे:
स्वराज की प्राप्ति: भारत के लिए स्वशासन या पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना।
जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ न्याय: इस जघन्य अपराध के लिए दोषियों को दंडित करना।
खिलाफत मुद्दे का समाधान: तुर्की के खलीफा के अधिकारों की बहाली।
असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम – विरोध का अहिंसक हथियार
गांधी जी ने आंदोलन को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया था, जिसमें बहिष्कार (Boycott) और निर्माण (Construction) दोनों पहलू शामिल थे।
बहिष्कार के कार्यक्रम (Negative Programme):- भारतीयों ने अंग्रेजों द्वारा दी गई उपाधियों (जैसे 'नाइटहुड') और सम्मानों को लौटाना शुरू कर दिया। वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और भारतीय 'पंचायती अदालतों' में न्याय के लिए जाने लगे। छात्रों और शिक्षकों ने ब्रिटिश-नियंत्रित शैक्षणिक संस्थानों का बहिष्कार किया। इसके बजाय, राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज (जैसे काशी विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया, गुजरात विद्यापीठ) स्थापित किए गए। भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के तहत होने वाले चुनावों और परिषदों में भाग लेने से इनकार कर दिया। विदेशी कपड़ों, शराब और अन्य सामानों का बहिष्कार किया गया और उन्हें सार्वजनिक रूप से जलाया गया। यह आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के विचार को बढ़ावा देने के लिए था। किसी भी सरकारी कार्यक्रम या जश्न में शामिल होने से इनकार किया गया। कुछ भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार के तहत अपनी नौकरियों से इस्तीफा दे दिया।
निर्माण के कार्यक्रम (Constructive Programme):केवल बहिष्कार ही नहीं, गांधी जी ने सकारात्मक कार्यों पर भी जोर दिया विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ-साथ, भारतीय हस्तकला और उद्योगों को बढ़ावा दिया गया, विशेषकर खादी को। चरखा हर घर का प्रतीक बन गया। सरकारी स्कूलों के बहिष्कार के बाद, छात्रों के लिए अपने देश की संस्कृति और मूल्यों पर आधारित राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना की गई। समाज में छुआछूत जैसी कुरीतियों को खत्म करने पर जोर दिया गया ताकि समाज के सभी वर्ग एकजुट हो सकें। गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन करके दोनों समुदायों को एक साथ लाने का प्रयास किया, जो आंदोलन की एक बड़ी ताकत बनी।
असहयोग आंदोलन का प्रभाव – जन-जन का आंदोलन
असहयोग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नया अध्याय खोला। यह पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन था जिसमें समाज के हर वर्ग – किसान, मजदूर, छात्र, महिलाएँ, व्यापारी और बुद्धिजीवी – ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह एक सच्चा जन आंदोलन बन गया। दोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया। सरकारी संस्थानों का ठप पड़ना, विदेशी वस्तुओं की बिक्री में भारी गिरावट, और जनता के बढ़ते विरोध ने अंग्रेजों को सोचने पर मजबूर कर दिया। लोगों में अपनी आज़ादी के प्रति गहरी चेतना और आत्मविश्वास पैदा हुआ। उन्हें लगा कि वे अपनी शक्ति से ब्रिटिश सरकार को चुनौती दे सकते हैं। यह आंदोलन महात्मा गांधी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करने में निर्णायक साबित हुआ। उनकी अहिंसक रणनीति और जनता से सीधे जुड़ने की क्षमता ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' बना दिया। स्वदेशी वस्तुओं, खासकर खादी को अपनाना, न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था बल्कि यह आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बन गया। खिलाफत आंदोलन के साथ जुड़ने से शुरुआत में हिंदू और मुसलमानों के बीच अद्भुत एकता देखने को मिली।
आंदोलन का स्थगन – एक अप्रत्याशित मोड़
फरवरी 1922 में, असहयोग आंदोलन को उस समय एक बड़ा झटका लगा जब उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक स्थान पर एक हिंसक घटना हुई। प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। गांधी जी, जो अहिंसा के कट्टर समर्थक थे, इस घटना से बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि जनता अभी अहिंसा के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है और हिंसा आंदोलन को भटका सकती है। 11 फरवरी 1922 को, गांधी जी ने अचानक असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा कर दी। उनके इस फैसले से कांग्रेस के कई नेता निराश हुए, लेकिन गांधी जी अपने सिद्धांतों पर अटल थे।
भले ही असहयोग आंदोलन को बीच में ही रोकना पड़ा हो, लेकिन इसकी विरासत अविस्मरणीय है। इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। इसने दिखाया कि अहिंसा भी एक शक्तिशाली हथियार हो सकती है। इसने भारतीय जनता को एकजुट करना सिखाया। इसने भविष्य के आंदोलनों, जैसे सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) और भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) की नींव रखी। इसने भारतीय लोगों के मन में स्वशासन की गहरी इच्छा जगाई और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का आत्मविश्वास दिया।
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आज, 1 अगस्त को, जब हम असहयोग आंदोलन की घोषणा के इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हैं, तो हमें महात्मा गांधी के दूरदर्शिता और उनके अहिंसक संघर्ष के महत्व को समझना चाहिए. यह हमें याद दिलाता है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति ने अपने सिद्धांतों और अदम्य इच्छाशक्ति से एक विशाल साम्राज्य को चुनौती दी और अंततः हमें आज़ादी दिलाई. यह सिर्फ़ इतिहास का एक पन्ना नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय चेतना का एक अविस्मरणीय अध्याय है.
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